नए समय की ये चाल मुबारक तुम्हें,
नव नूतन ये साल मुबारक तुम्हें।
है सलामत नहीं इक भी चिड़िया का घर,
ये बीहड़ सा काल मुबारक तुम्हें ।
जल रहा है बदन गंगा जल से यहां
मेरी माता का हाल मुबारक तुम्हें ।
है कोहरा मई में, दिसंबर में बारिश,
प्रकति का कमाल मुबारक तुम्हें ।
श्वास न लो मरो श्वास लो तो मरो,
मृत्यु ऐसी अकाल मुबारक तुम्हें ।
बट गया धर्मो में और हिंसा बढ़ी,
ईश इतना विशाल मुबारक तुम्हें ।
पाखंड कुरीति अंधविश्वास सब,
पिछली सदियों के जाल मुबारक तुम्हें ।
नए बरस में बनोगे क्या इंसान तुम?
सोचना, ये सवाल मुबारक तुम्हें ।
खैर छोड़ो अभी जश्न हो जाने दो,
हो न वर्ष कभी हानिकारक तुम्हे ।।